मध्यकालीन शिक्षा
आठवीं शताब्दी मे भारत पर मुसलमानों के आक्रमण
आरम्भ हो गए थे। लेकिन यह आक्रमण मुख्यतः भारतीय धन दौलत को लूटने के लिए ही थे।
मोहम्मद गौरी पहला मुसलमान शासक था, जिसने बारहवीं शताब्दी के अंत मे भारत मे
मुस्लिम राज्य का शिलान्यास किया। भारत मे मुस्लिम शासन लगभग साढ़े पाँच सौ वर्षों
( कुतबुद्दीन एबक के राज्यरोहन 1206 से प्लासी के युद्ध 1757 ) तक रहा। मुस्लिम
शासक विजेता के रूप मे भारत मे आए थे। धार्मिक कट्टरता उनके स्वभाव मे थी। अतएव उन्होंने अपने विचारों व मान्यताओ
के अनुरूप भारतीय शिक्षा के स्वरूप को बदलकर एक नई शिक्षा प्रणाली को जन्म दिया।
मुस्लिम शासकों ने प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने का योजनाबद्ध
प्रयत्न किया। भारतीय सांस्कृतिक केंद्रों को ध्वस्त किया, प्राचीन भारतीय
विधालयों को नष्ट किया और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विश्वविधालयों को धूल मे
मिलाया। जिस शिक्षा प्रणाली को मुस्लिम शासकों ने जन्म दिया, उसे हम मुस्लिम
शिक्षा प्रणाली कह सकते है।
मुस्लिम
शिक्षा के उदेश्य एवं आदर्श
(Aims
and Ideals of Muslim Education)
विभिन्न
मुस्लिम शासकों के शासन काल मे शिक्षा के उदेश्य भिन्न-भिन्न थे, क्योंकि उनका
स्वभाव, महत्वाकांक्षाएं और उदेश्य भिन्न-भिन्न थे। अलाउदधीन, फिरोज और औरंगजेब
ऐसे अनुदार शासक थे, जिनका मुख्य उदेश्य भारतीय संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करना था,
जबकि अल्तमश अकबर और शाहजाहं ऐसे उदार शासक थे, जिनका मुख्य उदेश्य शिक्षा का
प्रसार करना था। विभिन्न मुस्लिम शासकों के शासनकालों मे शिक्षा का उदेश्यों मे
भिन्नता के बावजूद सभी मुस्लिम शासक इस्लाम का प्रचार करना अपना परम कर्तव्य मानते
थे।
मुस्लिम
काल मे शिक्षा के उदेश्य एवं आदर्श निम्नलिखित थे-
1.
ज्ञान का प्रसार – इस्लामी शिक्षा का मुख्य
उदेश्य मुसलमानों मे ज्ञान का प्रकाश फैलाना था। इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत
मुहम्मद के अनुसार,”ज्ञान ही अमर्त है और इसके बिना मुक्ति नहीं मिल सकती उनका
कहना था कि मुसलमान के लिए ज्ञान प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि ज्ञान
प्राप्त करने से ही धर्म और अधर्म तथा कर्तव्य और अकर्तव्य का ज्ञान हो सकता है।
2.
इस्लाम धर्म का प्रचार एवं प्रसार- मुसलमानों का
विश्वास था कि इस्लाम धर्म का प्रचार करने वाला गाजी होता है, इसलिए
मुस्लिम शिक्षा का प्रमुख उदेश्य इस्लाम धर्म का प्रचार करना था। स्कूलों को
बनवाना उतना ही पवित्र मना जाता था, जितना
मस्जिदों को बनवाना, इसलिए मकतबों का निर्माण मस्जिदों के साथ ही किया जाता था।
मकतबों मे आरम्भ से ही कुरान और मदरसों मे इस्लामी धर्म तथा इस्लामी दर्शन कि
शिक्षा दी जाती थी।
3.
इस्लाम के सिद्धांतों और कानूनों का प्रसार- मुस्लिम शिक्षा का
एक यह भी उदेश्य था कि उसके माध्यम से इस्लाम के सिद्धांतों, रीति-रिवाजों,
सामाजिक प्रथाओं और कानूनों का प्रसार हो। इससे यह आशा कि जाती थी कि अन्य
धर्मावलम्बी इस्लाम से प्रभावित होंगे और उसकी शरण मे आने को प्रेरित होंगे।
4.
नैतिक एवं चारित्रिक विकास- मुस्लिम शिक्षा का
एक प्रमुख उदेश बालकों का नैतिक एवं चारित्रिक विकास करना था। मुहम्मद साहब कि द्रष्टि
मे चरित्र निर्माण के बाल पर ही मनुष्य अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है। हिन्दुओ
और मुसलमानों के नैतिक और चारित्रिक प्रतिमानों मे अंतर था, अतएव मुस्लिम शासकों
ने शिक्षा के द्वारा अपने नैतिक और चारित्रिक प्रतिमानों का प्रचार और प्रसार
किया। अनेक हिन्दुओ ने मुस्लिम शिक्षा संस्थाओं मे ज्ञान प्राप्त करके इस्लामी
नैतिकता मे अपना विश्वास प्रकट किया।
5.
मुस्लिम श्रेष्ठता कि स्थापना- मुस्लिम शिक्षा का
एक उदेश्य हिन्दुओ को मुस्लिम सभ्यता और संस्कृति से प्रभावित करके मुस्लिम
श्रेष्ठता को स्थापित करना था। शिक्षा के द्वारा हिन्दुओ को परिवर्तित करके उनको
मुस्लिम सभ्यता, संस्कृति, आदर्शों और जीवन-शैली का उपासक बनाना था। मुस्लिम
शासकों ने अपने इस उदेश्य कि प्राप्ति के लिए शैक्षणिक प्रयास किए, जिस से हिन्दू
अपना धर्म त्याग कर इस्लाम धर्म स्वीकार कर ले।
6.
सांसारिक ऐश्वर्य की प्राप्ति- इस्लाम पुनर्जन्म मे
विश्वास नही करता। उसका मुख्य उदेश्य सांसारिक सुख ऐश्वर्य को प्राप्त करना रहता
है। इसलिए मुस्लिम काल मे भी शिक्षा का उदेश्य भी सांसारिक ऐश्वर्य को प्राप्त
करना था। जो विधार्थी अपनी शिक्षा मे योग्य होते थे, उन्हे उच्च पद प्राप्त होते
थे। इस काल मे बहुत से हिन्दू भी इसी लोभ मे शिक्षा प्राप्त करने लगे और फारसी
भाषा के विद्वान होकर राज्य मे उच्च पदो पर निययुक्त हुए। एस.एम. जफर(S.M. Jaffer) ने लिखा है- “राज्य
द्वारा शिक्षितों को हर प्रकार से प्रोत्साहन दिया जाता था। काजी,वकील,वजीर आदि
पदों पर उन्हीं व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता था, जो शिक्षित होते थे। इस
प्रकार भावी जीवन के लिए तैयार करना मुस्लिम शिक्षा का विशेष उदेश्य था।“
7.
मुस्लिम शासन को सुद्रढ़ बनाना- मुस्लिम शासक का एक उदेश्य
राजनीतिक भी थी। मुस्लिम शासक अपने शासन को सुद्रढ़ करना चाहते थे, इसलिए
देशवासियों को वे ऐसी शिक्षा देना चाहते थे, जिसे प्राप्त करके वे उनका समर्थन
करने लगें। मुस्लिम शासकों का विचार था कि शिक्षा के द्वारा ही इस देश कि विशाल
हिन्दू जनता के द्रष्टिकोण को बदला जा सकता है और अपने शासन को सुद्रढ़ बनाया जा
सकता है।
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